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छोटी उम्र में बालकों को स्कूल भेजने का खतरा ककेप 266

जिस तरह एदेन निवासियों ने प्रकृति से पाठ सीखे, जिस तरह मूसा ने परमेश्वर का हस्तलेख अरब देश के पहाड़ियों और मैदानों में और बालक यीशु ने नासरत को पहाड़ियों में देखा उसी प्रकार इस युग के बालक भी परमेश्वर के विषय में सीख सकते हैं.अदृश्य परमेश्वर दृश्य पदार्थों द्वारा प्रदर्शित होता है. ककेप 266.3

जहां तक सम्भव है बालको को उसके आरम्भिक वर्षों ही से ऐसे स्थान में रखा जाय जहां यह अद्भुत पाठ्य पुस्तक उसके सामने खुली हो. ककेप 266.4

अपने बालकों को छोटी अवस्था में दूर स्कूल को न भेजिए.माता को सावधान होना चाहिए कि छोटे बालक के दिमाग को सांचे में ढलने के लिए किसी अन्य हाथों में न सौंपे माता-पिता को जब तक बालक आठ या दस वर्ष कीआयु तक न पहुंचे स्वयं पढ़ाना चाहिए.उनको पाठय कक्ष फूलों और चिड़ियों के बीच खुली हवा और उनकी पाठ्य पुस्तक प्रकृति का खजाना होना चाहिए.ज्योंही उनका मस्तिष्क ग्रहण करने योग्य हो सके माता-पिता को उनके आगे परमेश्वर की प्रकृति की विशाल पुस्तक खोल देनी चाहिए.ऐसे वातावरण में दिए गये पाठ शीघ्र भूले नहीं जा सकते. ककेप 266.5

बालकों को बहुत छोटी अवस्था में स्कूल भेजने से केवल उनका शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ ही संकट में पड़ जाता है परन्तु वे नैतिक दृष्टिकोण से भी हानि उठाते हैं.उनको ऐसे बालकों से परिचय होने का अवसर मिलता है जो शिष्टाचार में बिल्कुल असभ्य हैं.वे असभ्यों और गंवारों की संगत में पड़े होते हैं जो झूठ बोलते है, गाली बकते,चोरी करते और धोखा देते हैं, जो अपने अपराध विषयक ज्ञान को अपने से छोटों को पहुंचाने में प्रसन्न होते हैं.छोटे बालकों को यदि उनकी इच्छा पर छोड़ दिया तो भलाई की अपेक्षा बुराई को शीघ्र ग्रहण करते हैं.प्राकृतिक हृदय के संग बुरी आदतें खूब मेल खाती हैं.और जिन बातों को वे बचपन और बालकपन में देखते तथा सुनते हैं उनका उनके मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है.और वह बुरा बीज जो उनके कोमल हृदयों में बोया जाता है जड़ पकड़कर तीक्ष्ण कांटे बन जाते हैं जिनसे उनके माता-पिता को आघात पहुंचता है. ककेप 266.6