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कुलपिता और भविष्यवक्ता

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    अध्याय 13—विश्वास की परीक्षा

    यह अध्याय उत्पत्ति 16,17:18-20, 21:1-14, 22:1-19 पर आधारित है

    अब्राहम ने बिना प्रश्न किए एक पुत्र की प्रतिज्ञा को स्वीकार कर लिया था, लेकिन उसने परमेश्वर को अपने समयानुसार और अपने तरीके से अपने वचन को पूरा करने की प्रतीक्षा नहीं की। परमेश्वर की सामर्थ्य में उसके विश्वास की परीक्षा के लिये विलम्ब को अनुमति दी गई, लेकिन वह इसमें सफल नहीं हो सका। यह सोचकर कि बुढ़ापे में पुत्र प्राप्ति असभंव थी, सारै नेईश्वरीय प्रयोजन को पूर्ण कराने हेतु योजना के तौर पर अब्राहम को सलाह दी कि वह उसकी दासियों में से एक को दूसरी पत्नी के रूप में अपना ले। बहुर्विवाह इतना व्यापक हो गया था कि उसे पाप नहीं माना जाता था, लेकिन ये प्रथा परमेश्वर की व्यवस्था का उल्लंघन थी और पारिवारिक सम्बन्ध की पवित्रता और शान्ति के लिये हानिकारक थी। अब्राहम का हाजिरा से विवाह न केवल उसके घराने के लिये वरन्‌ आने वाली पीढ़ियों के लिये भी हानिकारक सिद्ध हुआ। PPHin 140.1

    अब्राहम की पत्नी का सम्मान पाने से प्रसन्‍न होकर और अब्राहम से उत्पन्न एक महान वंश की माँ कहलाने की आशा में, हाजिरा घमण्डी और डींगमार हो गई, और अपनी मालकिन से घृणा करने लगी। परस्पर ईर्ष्या के कारण एक खुशहाल रह रहे परिवार की शान्ति भंग हो गईं। दोनों के आरोपों को सुनने के लिये बाध्य, अब्राहम व्यर्थ में सामनन्‍जस्य पुनःस्थापित करने का प्रयत्न करता । हालांकि सारे के निवेदन पर उसने हाजिरा से विवाह किया था, लेकिन अब सारे उसी को गलत ठहरा कर उसे उलाहना देने लगी। उसने हाजिरा को भगा देना चाहा लेकिन अब्राहम ने ऐसा नहीं होने दिया। क्योंकि हाजिरा उसके बच्चे की माँ बनने वाली थी और इस प्रतिज्ञा के पुत्र की वह आशा कर रहा था। हाजिरा सारे की दासी थी इसलिये अब्राहम ने अभी भी उसे सारै के नियन्त्रण में छोड़ा । उसकी घृष्टता से भड़की हुईसारै की निष्ठुरता को उसका अंहकारी स्वभाव सहन न कर सका और “जब सारै उसको दुख देने लगी, वह उसके सामने से भाग गई” ।PPHin 140.2

    उसने जंगल की राह पकड़ी और जब वह अकेली और मित्रहीन, जल के एक सोते के पास विश्राम कर रही थी तो यहोवा का दूत मानव के रूप में उसके सामने प्रकट हुआ। ‘हे सारे की दासी’ कहकर संबोधित करते हुए उसने हाजिरा को उसके स्थान और कर्तव्य का स्मरण कराया और उससे कहा, “अपनी स्वामिनी के पास लौट जा और उसके वश में रहा।” लेकिन इस फटकार के साथ सांत्वना के शब्द भी थे। “परमेश्वर ने तेरी मनोव्यथा को सुन लिया है।” “मैं तेरे वंश को बहुत बढ़ाऊंगा, यहां तक कि बहुतयात के कारण उसकी गणना न हो सकेगी ।” और परमेश्वर की कृपा के स्थायी स्मरणपत्र के तौर पर उसे अपने पुत्र का नाम इश्माएल रखने को कहा गया जिसका मतलब है, “परमेश्वर सुनता है।’ PPHin 140.3

    जब अब्राहम सौ वर्ष का था, उसे पुत्र प्राप्ति की प्रतिज्ञा को दोहराया गया और यह आश्वासन दिया गया कि उसका भविष्य का उत्तराधिकारी सारे की संतान होगा। लेकिन अब्राहम को अभी भी यह प्रतिज्ञा समझ नहीं आई। उसे एकदम इश्माएल का ध्यान आया कि उसी के माध्यम से परमेश्वर की अनुग्रहकारी योजना सम्पन्न होगी। पुत्र-मोह में वह बोला, “इश्माएल तेरी दृष्टि में बना रहे, वही बहुत है।'फिर से स्पष्ट शब्दों में प्रतिज्ञा की गई, “निश्चय तेरी पत्नी सारै के तुझ से एक पुत्र उत्पन्न होगा और तू उसका नाम इसहाक रखना और मैं उसके साथ वाचा बांधूगा।” अभी भी परमेश्वर ने पिता की प्रार्थना को अनसुना नहीं किया। “इश्माएल के विषय में भी मैंने तेरी सुनी है, में उसको भी आशीष दूंगा, और उसे फलवन्त करूंगा और अत्यन्त ही बढ़ा दूँगा।PPHin 141.1

    जीवन भर की प्रतीक्षा पश्चात, इसाहक के जन्म में उनकी सबसे प्रिय आशा के पूर्ण होने पर, अब्राहम और सारे के तम्बुओं में प्रसन्‍नता छा गई। लेकिन हाजिरा के लिये यह घटनाउसकी अनुराग सहित संजोए महत्वाकाक्षाओं की पराजय थी। इश्माएल को, जो अब एक नवयुवक हो गया था, तम्बू में रहने वाले सभी लोग अब्राहम की सम्पत्ति का व उसके वंशजों को वचनबद्ध आशीषों का उत्तराधिकारी मानते थे। अब उसे अचानक ही एक तरफ कर दिया गया और निराश हुए माता और पुत्र सारै के पुत्र से घृणा करने लगे। सार्वजनिक उत्सव ने ईर्ष्या को और बढ़ा दिया और इश्माएल का दुसस्‍्सहास इतना बढ़ गया कि वह प्रकट रूप में परमेश्वर की प्रतिज्ञा के उत्तराधिकारी क तिरस्कार करने लगा। सारे ने इश्माएल के उग्र व्यवहार में असामंजस्य का स्थायी स्रोत देखा और अब्राहम से विनती की कि वह हाजिरा और उसके पुत्र इश्माएल को वहां से भेज दे। कुलपिता के लिये यह बहुत संकटमयी था। इश्माएल को जो अभी भी उसे प्रिय था, वह कैसे भेज देता? दुविधा की स्थिति में उसने ईश्वरीय मार्गदर्शन के लिए विनती की। पवित्र स्वर्गदूत के माध्यम से परमेश्वर ने उसे सारे की इच्छा पूरी करने का निर्देश दिया, इसी तरह वह अपने परिवार का सुख और शान्ति पुनःस्थापित कर सकता था और इसके लिये वह हाजिरा और इश्माएल के प्रति अपने प्रेम को बाधा नहीं बनाना चाहता था। स्वर्गदूत ने उसे सांत्वना भरा आश्वासन दिया कि अपने पिता के घर से पृथक होने के बावजूद, इश्माएल को परमेश्वर कभी नहीं छोड़ेगा, उसका जीवन सुरक्षित होगा और वह एक महान वंश का पिता होगा। अब्राहम ने स्वर्गवृत का कहा माना, लेकिन उसके लिये यह बहुत दुखद था। हाजिरा और अपने पुत्र को भेजते हुए, एक पिता का हृदय निःशब्द व्यथा से भर गया। PPHin 141.2

    अब्राहम को दिया गया निर्देश वैवाहिक सम्बन्ध की पवित्रता के सम्बन्ध में था और हर युग के लिये एक सीख था। वह स्पष्ट बताता है कि महात्याग भी करना पड़े तो भी इस सम्बन्ध के अधिकार और सुख की सुरक्षा अत्यन्त आवश्यक है। सारे ही अब्राहम की वैध पत्नी थी। उसके माँ और पत्नी होने के अधिकार को अन्य कोई भी नहीं बांट सकता था ।वह अपने पति का आदर करती थी और इस सन्दर्भ मे नए नियम में उसे एक उत्तम उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत किया गया है। लेकिन वह इस बात से असहमत थी कि अब्राहम का प्रेम किसी और के लिये भी हो और परमेश्वर ने उसकी प्रतिरोधी हाजिरा के निर्वासन की माँग को अनुचित नहीं ठहराया। अब्राहम और सारै दोनों ही ने परमेश्वर के सामर्थ्य पर सन्देह किया था और अब्राहम का हाजिरा से विवाह इसी गलती का परिणाम था।PPHin 142.1

    परमेश्वर ने अब्राहम को विश्वासियों का पिता होने के लिये बुलाया था और उसका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिये विश्वास का प्रतीक होना चाहिये था। लेकिन उसका विश्वास सम्पूर्ण नहीं था। सारे का उसकी पत्नी होने के तथ्य को छुपाने में हाजिरा से विवाह करने में उसने परमेश्वर में अविश्वास दिखाया। उसे विश्वास के सबसे ऊंचे मानक पर पहुँचाने के लिये, परमेश्वर ने उसकी एक और परीक्षा ली, जैसी शायद ही किसी ने सही हो। रात को स्वष्नदर्शन में उसे मोरिय्याह देश मं जाने का निर्देश मिला और वहां एक पहाड़ पर, जिसे परमेश्वर बताने वाला था, अपने पुत्र की होमबलि चढ़ाने को कहा गया। इस आज्ञा के मिलने के समय अब्राहम एक सौ बीस वर्ष का था। अपनी पीढ़ी में भी उसकी गणना वृद्ध-पुरूषों में होती थी। युवावस्था में वह संकटो का सामना करने और खतरों से खेलने में सक्षम था, लेकिन अब युवावस्था का जोश जा चुका था। जिसका सामना पुरूष के जाशे में कोई भी कर सकता है, वही दुख और संकट,जब पैर कब्र की ओर बढ़ रहे हो, हृदय को हताश कर सकते है। लेकिन परमेश्वर ने अब्राहम के लिये अपनी अन्तिम व सबसे कठिन परीक्षा तब तक सुरक्षित रखी थी जब तक कि वृद्धावस्था के बोझ से दबा अब्राहम चिंता और श्रम से विश्राम पाने की अभिलाषा करने लगा। PPHin 142.2

    कुलपिता, वैभव और सम्मान के साथ बेश॑बा में रहा था। वह धनवान था और देश के शासक उसे शक्तिशाली राजकुमार का सा सम्मान देते थे। उसके डेरों से बहुत दूरतक चरागाहों पर सैंकड़ो भेड़ें और गाय-बैल फैले हुए थे। तम्बुओं के चारों ओर उसके शर्णागतों के घर थे, जो उसके वफादार सेवक थे। स्वर्गने मानों आस्थगित आशा की धीरजवन्त सहनशक्ति में त्याग भरे जीवन को अपनी आशीष का मुकुट पहनाया था। PPHin 143.1

    विश्वास पर चलते हुए, अब्राहम ने अपना जन्म स्थान छोड़ दिया जहां उसके पित्रों की कब्रें थीं और परिजनों के घर थे। अपनी धरोहर में वह परदेशी होकर घूमता रहा। वचनबद्ध उत्तराधिकारी के जन्म के लिये उसने बहुत प्रतीक्षा की थी। परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हुए उसने इश्माएल को दूर भेज दिया । और अब जब वही बालक जिसकी इच्छा उन्हें वर्षो से थी किशोरावस्था में प्रवेश कर रहा था और कुलपिता को अपनी आशा का पूर्ण होना प्रतीत हो रहा था, तब उसके सामने वह परीक्षा आईं जो अन्य सब परीक्षाओं से कठिन थी।PPHin 143.2

    जिन शब्दों में उस आज्ञा की अभिव्यक्ति हुई, उन शब्दों ने उस पिता के हृदय को यातना से मरोड़ दिया होगा। “अपने पुत्र को, जिससे तू प्रेम रखता है संग लेकर होमबलि करके चढ़ा।” इसहाक अब्राहम के घर का प्रकाश या उसकी वृद्धावस्था का आश्वासन और सबसे अहम वचनबद्ध आशीष का उत्तराधिकारी था। दुर्घटना या बीमारी के कारण ऐसे पुत्र को खाना प्रेमपूर्ण पिता के लिये मर्मभेदी होता; शोक से उसके शरीर को झुका दिया होता; लेकिन उसे आज्ञा दी गई कि वह अपने ही हाथों अपने पुत्र का खून बहाए। उसे एक भयानक असंभवना प्रतीत हो रही थी।पास ही में शैतान ने सलाह दी कि अब्राहम को धोखा हुआ होगा, क्‍योंकि पवित्र आज्ञा कहती है, “तू हत्या न करना” और परमेश्वर ने जिस पर रोक लगाई है उसे वह कैसे होने दे सकता है। अब्राहम तम्बू के बाहर गया और उसने बादल रहित आकाश के मद्धम प्रकाश को देखा और पचास वर्ष पूर्व दी गई प्रतिज्ञा का स्मरण किया, जिसके अनुसार उसके वंश को तारों के समान असंख्य होना था। यदि इस प्रतिज्ञा को इसहाक द्वारा सम्पन्न होना था, तो उसे मृत्यु के घाट कैसे उतारा जा सकता था? अब्राहम यह विश्वास करने को ललचाया कि उसे कोई धोखा हुआ है। सन्देह और यातना में उसने नतमस्तक होकर प्रार्थना की, जैसे कभी न की थी कि उसे उस भयानक कार्य को करने की आज्ञा का आश्वासन दिया जाए। उसने सदोम के विनाश में परमेश्वर के उद्देश्य को स्पष्ट करने हेतु भेजे गए स्वर्गदूतों को स्मरण किया ओर उन्हें भी जिन्होंने उसे इसहाक के पैदा होने का आश्वासन दिया था और वह उसी स्थान पर गया जहां वह कई बार स्वर्ग के सन्देशवाहकों से मिला था, इस आशा में कि वह दोबारा उनसे मिलकर और निर्देश प्राप्त कर सके, लेकिन उसकी सहायता के लिये कोई नहीं आया। उसे अपने आप को अंधकार में घिरा पाया, लेकिन परमेश्वर की आज्ञा उसके कानों में गूँज रही थी, “अपने पुत्र को अर्थात अपने इकलौते पुत्र इसाहक को, जिससे तू प्रेम रखता है, संग लेकर जा”। इस आज्ञा का पालन करना अनिवार्य था और वह बिलम्ब करने का दुस्साहस नहीं कर सका। दिन निकट आ रहा था और उसे अपनी यात्रा पर निकलना था।PPHin 143.3

    तम्बू में लौटकर, वह वहां गया जहां इसाहक किशोरावस्था और निष्कपटता की गहरी व शान्तिपूर्ण नींद सो रहा था। एक क्षण के लिये पिता ने अपने पुत्र का प्यारा सा चेहरा देखा और कांपते हुए मुड़ गया। वह सारे के निकट गया जो अभी सो रही थी। क्‍या उसे सारे को जगाना चाहिये कि एक बारवह अपने पुत्र को गले लगा ले? क्‍या उसे परमेश्वर की आज्ञा के बारे में उसे बताना चाहिये? वह अपने हृदय को हल्का करना चाहता था और इस कष्टदायक कार्य को उसके साथ बांटनाचाहता था, लेकिन वह इस डर से रूक गया कि वह उसको बाधित करेगी। इसहाक सारै का अभिमान और आनन्द था, उसका जीवन उसी में सीमित था और मातृप्रेम होमबलि की अनुमति नहीं देता। आखिरकार अब्राहम ने अपने पुत्र को बुलाया और उसे दूर पहाड़ पर बलि की भेंट की आज्ञा के बारे में बताया। भ्रमण के दौरान बनाई गई वेदियों पर इसहाक अपने पिता के साथ आराधना के लिये प्रायः जाता था और इस कारण यह बुलावा कोई आश्चर्य का विषय नहीं था। यात्रा की तैयारियाँ जल्द ही सम्पन्न हो गई। लकड़ी तैयार की गई और खच्चर पर लाद दी गई और दो दासों के साथ आगे भेज दी गई ।PPHin 144.1

    पिता और पुत्र साथ-साथ चुप्पी साधे यात्रा करते रहे। कुलपिता का हृदय उस गम्भीर रहस्य में विचारमग्न था और उसे बात करने की इच्छा नहीं थी। वह उस अभिमानी व प्रेमपूर्ण माँ का बारे में और उस दिन के बारे में जब वह अकेला उसके पास लौटेगा, सोच रहा था। उसे भली-भांति ज्ञात था कि जब वह छुरी उसके पुत्र के प्राण लेगी तभी वह सारै के हृदय को भी चीर देगी। PPHin 145.1

    वह दिन-जो अब्राहम के अनुभव में सबसे लम्बा था, धीरे-धीरे बीतने को आया। जब उसका पुत्र और नौजवान दास सो रहे थे, अब्राहम से रातभर प्रार्थना में व्यतीत की, इस आशा में कि स्वर्ग से कोई सन्देशवाहक उसे आकर कहेगा कि इतनी परीक्षा पर्याप्त थी और वह अपने पुत्र को उसकी मां के पास सुरक्षित ले जा पाएगा। लेकिन उसको उत्पीड़ित आत्मा को चेन नहीं मिला। एक और दिन, एक और प्रार्थना और दीनता भरी रात बीती और वह आज्ञा, जिसका पालन करने से वह पुत्रहीन हो जाएगा, उसके कानों में गूंजती रही । शैतान उसके मन में सन्देह और अविश्वास उत्पन्न करता रहा, लेकिन अब्राहम ने उसके प्रस्तावों को प्रतिरोध किया। यात्रा के तीसरे दिन, कुलपिता ने उत्तर दिशा में मोरिय्याह पर्वत पर मंडराते हुए वैभपूर्ण बादल को देखा, जो कि एक वचनबद्ध चिन्ह था और वह समझ गया कि जो आवाज सुनी थी, वह स्वर्ग से थी ।अभी भी वह परमेश्वर पर नहीं बड़बड़ाया, वरन उसकी अच्छाई और विश्वसनीयता के प्रमाणों के आधार पर अपने हृदय को ढाढस बंधाता रहा। इस पुत्र का जन्म अप्रत्याशित था और क्‍या जिसने यह वरदान दिया था, उसे अपने द्वारा दिये गए को वापस लेने का अधिकार नहीं था? फिर विश्वास ने प्रतिज्ञा को दोहराया, “इसहाक ही से तेरा वंश कहलाएगा” वंश जो समुद्र के तीर के बालू के समान अनगिनत होगा। इसहाक चमत्कार से उत्पन्न हुआ बच्चा था, और क्‍या वही सामर्थ्य जिसने उसे जीवन दिया उसे बहाल नहीं कर सकता था। जो देखा था, उसके आगे देखते हुए अब्राहम ने पवित्र वचन को थाम लिया, “उसने मान लिया कि परमेश्वर सामर्थी है कि उसे मरे हुओं में से जिलाएं”। इब्रानियों 11:19PPHin 145.2

    लेकिन फिर भी परमेश्वर के अलावा और कोई नहीं समझ सकता कि उस पिता का बलिदान कितना महान था, जिसने अपने पुत्र को मृत्यु के लिये समर्पित कर दिया। अब्राहम की इच्छा थी कि इस वियोग के दृश्य का केवल परमेश्वर साक्षी हो। उसने अपने दासों को कहा, ““गधेके पास यहीं ठहरे रहो, यह लड़का और मैं वहां तक जाकर और दण्डवत करके, फिर तुम्हारे पास लौट आएंगे” । लकड़ी को इसहाक पर लाद दिया गया, जिसकी बलि चढ़ानी था, पिता ने छुरी और आग अपने हाथ में ली और वे दोनों पहाड़ के शिखर की ओर चढ़ने लगे और इस दौरान नौजवान चुपचाप सोचता रहा कि डेरे और पशु समूह से दूर, बलि के लिये भेंट कहां से आएगी। आखिरकार उसने पिता से पूछा, “हे मेरे पिता, देख, आग और लकड़ी तो है, परहोमबलि के लिये भेड़ कहाँ है?” आह ये कैसी परीक्षा थी! ‘हे मेरे पिता’ किस तरह इस प्रिय संबोधन ने अब्राहम का हृदय चीर दिया। अभी नहीं वह उसे अभी नहीं बता सकता था, उसने कहा, “हे मेरे पुत्र, परमेश्वर होमबलि की भेड़ का उपाय आप ही करेगा।” PPHin 145.3

    निर्धारित स्थान पर उन्होंने वेदी बनाई और उस पर लकड़ी को रख दिया। फिर कैंपकँपाती आवाज में उसे अपने पुत्र को पवित्र सन्देश का खुलासा किया। अपनी नियति जानकर इसहाक भयभीत हुआ और भौंचक्का रह गया, लेकिन उसने प्रतिरोध नहीं किया। वह चाहता तो स्वयं को बचा सकता था, तीन यातनापूर्ण दिनों के संघर्ष से थका हुआ, वृद्ध-पुरूष शक्तिशाली नवयुवक की इच्छा का विरोध नहीं करता। लेकिन इसहाक को बचपन से तत्पर, विश्वासपूर्ण आज्ञा-पालन में प्रशिक्षित किया गया था और जब उसे परमेश्वर की योजना से अवगत कराया गया, तो उसने स्वैच्छिक विनम्रता से स्वयं को समर्पित कर दिया। अब्राहम के विश्वास में वह सहभागी था और उसे लगा कि यह सम्मान की बात है कि परमेश्वर को होमबलि चढ़ाने के लिये उसे प्राण न्‍यौछावर करने के लिये चुना गया था। वह नम्नतापूर्वक अपने पिता के दुःख को कम करने का प्रयत्न करता है और उसके निर्बल हाथों को प्रोत्साहित करता है कि वे वेदी पर उसे बांधने वाली रस्सियों को कस दे। PPHin 146.1

    और अब प्रेम के अन्तिम शब्द बोले गए, आखिरी आंसूँबहाए गए और अन्तिम आलिगंन दिया गया। पिता ने पुत्र का वध करने के लिये छरी को ऊंचा उठाया कि अचानक उसका हाथ रूक गया। परमेश्वर के दूत ने स्वर्ग से कुलपिता को पुकार कर कहा, “अब्राहम, अग्गरहम” अब्राहम ने तुरन्त उत्तर दिया “देख मैं यहहूँं” और आवाज फिर सुनाई दी, “इस लड़के पर हाथ मत बढ़ा और न उसे कुछ कर, क्‍योंकि तूने जो मुझसे अपने पुत्र वरन्‌ अपने इकलौते पुत्र को भी नहीं रख छोड़ा, इसमें में अब जान गया हूँ कि तू परमेश्वर का भय मानता है।PPHin 146.2

    फिर अब्राहम ने देखा, “कि एक मेढ़ा एक झाड़ी में फंसा हुआ था, और अविलम्ब नए शिकार को लाते हुए उसने “अपने पुत्र के स्थान पर” उसे होमबलि करके चढ़ाया। प्रसन्‍नता और कृतज्ञता से भरपूर अब्राहम ने उस पवित्र स्थान का नाम “यहोवा यिरे” रखा, “यहोवा उपाय करेगा ।PPHin 146.3

    मोरिय्याह पर्वत पर परमेश्वर ने, फिर से, अब्राहम और उसके वंश और सभी आने वाली पीढ़ियों के लिये एक पवित्र शपथ द्वारा आशीष का आश्वासन देते हुए अपनी वाचा का नवीनीकरण किया, “यहोवा की यह वाणी है, कि मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ. कि तूने जो यह काम किया है कि अपने पुत्र, वरन्‌ अपने इकलोते पुत्र को भी नहीं रख छोड़ा, इस कारण मैं निश्चय तुझे आशीष दूँगा, और निश्चय तेरे वंश को आकाश के तारागण और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान अनगिनत करूंगा, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा, और पृथ्वी की सारी जातियाँ तेरे वंश के कारण आशीषित होंगी। में यह इसलिये करूंगा क्योंकि तुमने मेरी आज्ञा का पालन किया ।” PPHin 147.1

    अब्राहम के विश्वास का यह महान कार्य प्रकाश के एक स्तम्भ के समान है जो सभी उत्तरगामी युगों में परमेश्वर के दासों के मार्ग को दीप्तिमान करता है। अब्राहम परमेश्वर की इच्छा की पूरी करने से बचने का बहाना नहीं ढूंढ रहा था। तीन दिनों के यात्रा के दौरान उसके पास तक॑-विर्तक करने के लिये और यदि सन्देह करना उसका स्वभाव होता तो परमेश्वर पर सन्देह करने के लिये पर्याप्त समय था। वह तक॑ रख सकता था अपने ही पुत्र का वध करने के कारण वह हत्यारा व दूसरा कैेन कहलाता, और उसकी शिक्षा का लोग तिरस्कार करते, जिससे अपने के लिये उसके परोपकार की योग्यता नष्ट हो जाती। उसने विनती की होगी किउसकी आयु को ध्यान में रख कर उसे आज्ञा पालन से छूट दे दी जाए। लेकिन कुलपिता ने इनमें से किसी भी बहाने का सहारा नहीं लिया। अब्राहम मनुष्य था, उसकी भावनाएँ और लगाव हमारे जैसे ही थे लेकिन वह यह पूछने के लिये नहीं रूका कि यदि इसहाक को मार दिया जाएगा तो प्रतिज्ञा कैसे पूरी होगी। वह अपने दुखते हृदय के साथ तर्क-विर्तक में नहीं पड़ा। उसे ज्ञात था कि परमेश्वर अपने सब नियमों में न्‍्यायाप्रिय और धर्मी है और उसने पूरे तरह से आज्ञा का पालन किया। “अब्राहम ने परमेश्वर का विश्वास किया और यह उसके लिये धर्म गिना गया, और वह परमेश्वर का मित्र कहलाया ।” याकूब 2:23और पौलुस कहता है, “जो विश्वास करने वाले हैं, वे ही अब्राहम की संतान है” उत्पत्ति 3:7। लेकिन अब्राहम का विश्वास उसके कामों द्वारा प्रकट होता था। याकूब 2:21,22में लिखा है, “जब हमारे पिता अब्राहम ने अपने पुत्र इसहाक को वेदी पर चढ़ाया तो क्‍या वह कर्मों से धार्मिक न ठहरा था?” कई ऐसे हैं जो विश्वास और कर्मा के सम्बन्ध को समझने में असफल हो जाते हैं। वे कहते है, “केवल मसीह में विश्वास रखो और तुम सुरक्षित हो। व्यवस्था का पालन करने से तुम्हारा कोई वास्ता नहीं”। लेकिन वास्तविक विश्वास आज्ञापालन में प्रकट होता है। यहुन्ना 8:39में मसीह अविश्वासी यहूदियों से कहता है, “यदि तुम अब्राहम की संतान होते तो अब्राहम के समान काम करते है” और विश्वास के पिता के सन्दर्भ में परमेश्वर कहता है, “अब्राहम ने मेरी मानी, और जो मैंने उसे सौंपा था उसको और मेरी आज्ञाओं, विधियों और व्यवस्था का पालन किया” उत्पत्ति 26:5 ।याकूब 2:17में प्रेरित याकूब कहता है, “विश्वास यदि कर्म सहित न हो तो अपने स्वभाव में मरा हुआ है।” 1 यहुन्ना 5:3 में यहुन्ना, प्रेम के विषय में विस्तार से मनन करता है और कहता है, “क्योंकि परमेश्वर से प्रेम रखना यह है कि हम उसकी आज्ञाओं को मानें । PPHin 147.2

    प्ररूप और प्रतिज्ञा से परमेश्वर ने, “अब्राहम को यह सुसमाचार सुना दिया ।” और कुलपिता का विश्वास अपनेउद्धारकर्ता पर कन्द्रित हो गया। यहुन्ना 8:56 में मसीह ने यहूदियों से कहा, “तुम्हारा पिता अब्राहम मेरा दिन देखने की आशा से बहुत मगन था, और उसने देखा और आनन्द किया।” इसहाक के स्थान पर होमबलि में चढ़ाया गया मेढ़ा परमेश्वर के पुत्र का प्रतीक था, जिसे हमारे स्थान पर बलि की भेंट होना था। जब परमेश्वर की आज्ञा के उल्लंघन के परिणामस्वरूप मनुष्य की मृत्यु निश्चित थी तब पिता ने, अपने पुत्र की ओर देख कर, पापी से कहा, “जीता रह, मुझे उद्धार मूल्य मिल गया है।’PPHin 148.1

    सुसमाचार की वास्तविकता से अब्राहम को प्रभावित करने और उसके विश्वास को परखने के लिये परमेश्वर ने उसे अपने पुत्र की बलि चढ़ाने को कहा। उस भयावह परीक्षा के अंधकारमय दिनों जो यातनाएं उसने सही उन्हें इसलिए स्वीकृति दी गई, ताकि अपने अनुभव से वह मनुष्य के उद्धार के लिये अनन्त परमेश्वर द्वारा किये गए त्याग की महानता को समझ सके। अपने ही पुत्र के बलिदान को छोड़ अन्य कोई भी परीक्षा इस तरह आत्मा को उत्पीड़ित नहीं करती । परमेश्वर ने अपने पुत्र को यातनाभरी और शर्मनाक मृत्यु को सौंप दिया। जिन स्वर्गदूतों ने परमेश्वर के पुत्र का अपमानित होना और आत्मा की वेदना को देखा था, उन्हें हस्तक्षेप की अनुमति नहीं थी, जैसे इसहाक के विषय में थी। किसी आवाज ने चिल्ला कर नहीं कहा, “बहुत हुआ” । पतित वंश को बचाने के लिये प्रतापी राजा ने अपना जीवन दे दिया। परमेश्वर के प्रेम और असीमित दयाभाव का इससे बढ़कर उचित उदाहरण क्या हो सकता है”? रोमियों 8:32में लिखा है, “जिसने अपने निज पुत्र को भी न रख छोड़ा, परन्तु उसे हम सब के लिये दे दिया, वह उसके साथ हमें और सब कुछ क्‍यों न देगा”?PPHin 148.2

    अब्राहम से माँगा गया बलिदान केवल उसी की भलाई के लिये नहीं था और न ही पूर्णतया उत्तरगामी पीढ़ियों की सुविधा के लिये था, वरन्‌ अन्य ग्रहों और स्वर्ग के निष्पाप बुद्धिजीवियों के निर्देशन के लिये भी था। मसीह और शैतान के बीच संघर्ष की पृष्ठभूमि जिस पर उद्धार की योजना बनाईं गई सृष्टि की अभ्यास पुस्तिका है। क्योंकि अब्राहम ने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के प्रति विश्वास का अभाव दिखाया था, शैतान ने परमेश्वर और स्वर्गदूतों की उपस्थिति में उस पर आरोप लगाया कि वह वाचा के प्रतिबन्ध का अनुपालन करने में असफल रहा था और उसकी आशीषों के योग्य नहीं था। परमेश्वर अपने सेवक की सत्यनिष्ठा को समस्त स्वर्ग के सामने प्रमाणित करना चाहता था और उदाहरण द्वारा समझाना चाहता था कि सम्पूर्ण आज्ञाकारिता ही स्वीकार्य है और उनके सामने उद्धार की योजना को और स्पष्टता से बताना चाहता था।PPHin 149.1

    स्वर्ग के प्राणी साक्षी थे उस दृश्य के जब अब्राहम के विश्वास को और इसहाक के समर्पण को परखा गया। यह परीक्षा आदम पर लाई गईं परीक्षा से बहुत ज्यादा कठिन थी। हमारे प्रथम अभिभावकों पर निषेधाज्ञा का अनुपालन करने में कोई पीड़ा सम्मिलित नहीं थी, लेकिन अब्राहम को दी हुईं आज्ञा अत्यन्त दुखदायी बलिदान मांगती थी। समस्त स्वर्ग अब्राहम की अविचलित आज्ञापालन को विस्मय और सराहना से देखता रहा। समस्त स्वर्ग उसकी निष्ठा को सराह रहा था। शैतान के आरोप निराधार प्रमाणित हुए। परमेश्वर ने अपने सेवक से कहा, “अब मैं जान गया हूँ कि तू परमेश्वर का भय मानता है, क्योंकि तूने अपने पुत्र को अर्थात इकलौते पुत्र को भी मुझसे नहीं रख छोड़ा” । परमेश्वर की वाचा, जो अन्य ग्रहों के बुद्धिजीवियों के सामने शपथ द्वारा निश्चित की गई, इस बात का प्रमाण थी कि आज्ञापालन का प्रतिफल अवश्य मिलता है ।उद्धार के रहस्य को समझ पाना स्वर्गदूतों के लिये भी कठिन था- यह कल्पना करना कि स्वर्ग के सेनापति परमेश्वर के पुत्र को अपराधग्रस्त मनुष्य के लिये मरना था ।।जब अब्राहम को अपने पुत्र को बलिदान करने की आज्ञा दी गई तब स्वर्ग के प्राणियों की रूचि जागृत हुई। अत्यन्त गम्भीरता के साथ वे इस आज्ञा के पूरे होने के प्रत्येक चरण को देखते रहे। इसाहक के प्रश्न, “होमबलि के लिये भेड़ कहां है?” का अब्राहम ने उत्तर दिया, “परमेश्वर होमबलि की भेड़ का उपाय खुद ही करेगा” और जब पुत्र का वध करने से ठीक पहले पिता का हाथ थम गया, और परमेश्वर द्वारा दी गई भेड़ को इसाहक के स्थान पर बलि चढ़ाया गया, तब उद्धार के रहस्य पर प्रकाश डाला गया, और स्वर्गदूत भी मनुष्य के उद्धार के लिये परमेश्वर द्वारा किये गए निराले प्रयोजन को और स्पष्ट रूप से समझ गए । 1 पतरस 1:12 PPHin 149.2

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